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राधाकृष्ण का अलौकिक प्रेम !!

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सर्वोच्च प्रेम का प्रतीक : –
राधाकृष्ण !!!
✍️ २२४६

विनोदकुमार महाजन

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हमारे जीवन में हमेशा सर्वोच्च स्थान किसे होता है ?
धन,वैभव, पैसा ?
हरगिज नहीं !
हमारे जीवन में सर्वोच्च स्थान प्रेम का होता है !
संपूर्ण समर्पित प्रेम !
निष्पाप, निष्कलंक, निस्वार्थ रूप से संपूर्ण समर्पण !
ऐसा शुध्द, पवित्र प्रेम ही जीवन के लिए सबकुछ होता है !
जब ऐसा प्रेम करना जो जानता है,उसीके ही जीवन में सर्वोच्च आनंद की बहार आती है !
मगर वह प्रेम भी सच्चा ही चाहिए ! ढोंग,दिखावा, स्वार्थ भाव से किया गया प्रेम सच्चा प्रेम नहीं होता है !

इसिलिए अगर प्रेम करना ही है तो सच्चा प्रेम करो ! समर्पित प्रेम करो ! सबकुछ नौछावर करनेवाला प्रेम करो !

मगर क्या ऐसे भयंकर स्वार्थ के माहौल में , भयंकर घोर कलीयुग में ,सचमुच में ऐसा दिव्य प्रेम भी मिल सकेगा ?
जो देवताओं के ह्रदय से उत्पन्न होता है ?
यहां पर तो पग पग पर प्रेम के नाम पर छल,कपट,दिखावा,ढोंग बाहरी आडंबर ही दिखाई देता है !
क्या यह भी प्रेम हो सकता है ?

भक्त – भगवंत,
गुरू – शिष्य ,
माँ – बेटा यह प्रेम ऐसा ही होता है ! मित्रप्रेम भी ऐसा ही पवित्र, भव्यदिव्य,समर्पित होता है ! मगर उसके लिए भी , दोनों मित्रोँ के मन शुध्द और पवित्र होने ही चाहिए !

इसिलिए अगर आपको किसीसे प्रेम चाहिए या आप उसीसे पवित्र प्रेम की अपेक्षा करते है ,तो सबसे पहले उस व्यक्ति की ,विविध प्रकार से परीक्षा किजिए !
अगर प्रेम सचमुच में पवित्र होगा तो वह व्यक्ति जीवन भर के लिए आपके साथ जूडा रहेगा ! अगर उसका प्रेम झूठ, फरेब, धोखा है तो ऐसा व्यक्ति सदा के लिए, दूर चला जायेगा !
और हम ? प्रेम के झूठे जाल से बच जायेंगे !
क्योंकि प्रेम का जाल बिछाकर अगर हमसे कोई धोखा देता है तो ? शायद संपूर्ण जीवन ही बर्बाद हो जाता है !

राम हनुमान का प्रेम, कृष्ण अर्जुन का प्रेम, मीरा कृष्ण का प्रेम और…राधा कृष्ण का प्रेम भी ऐसा ही सर्वोच्च, स्वर्गीय, संपूर्ण समर्पित प्रेम था !
और आज ऐसा प्रेम प्राप्त करना लगभग असंभव है ! इसिलिए प्रेमजाल बिछाकर जीवन बर्बाद करने से बेहतर यही होगा की,सभी से दूरीयाँ बनाकर ही रहो ! क्योंकि आज के स्वार्थ के बाजार में ,आत्मा का शुध्द प्रेम असंभव है !

अब देखते है, राधाकृष्ण का अजरामर पवित्र प्रेम !

कृष्ण की सत्यभामा और रूक्मिणी दोनों पत्नियां थी !
और राधा कौन थी ?
सर्वोच्च प्रेम का प्रतीक !

इसिलिए सत्यभामा – कृष्ण ,
रूक्मिणी – कृष्ण ,
ऐसा कहने के बजाए ,
हम सभी सदैव, निरंतर, नितदिन, हरपल ,
राधा – कृष्ण ही कहते है !
पहले राधा का नाम ,बाद में कृष्ण !

राधा – कृष्ण !
दोनों तरफ से संपूर्ण समर्पित प्रेम !!
देह का नहीं बल्कि दोनों आत्माओं का मिलन !!!
संपूर्ण एकरूपता !
साक्षात आत्मा परमात्मा का मिलन !

इसिलिए हर जगहों पर राधा कृष्ण के ही मंदिर देखने को मिलते है ! दोनों की ही पूजा की जाती है ! दोनों का ही जाप भी किया जाता है !

मतलब ?
साफ है !
सर्वोच्च प्रेम का प्रतीक ?
राधा कृष्ण !!!

प्रत्यक्ष प्रभु परमात्मा भी सबसे पहले प्रेम को ही महत्व देता है !
और पवित्र प्रेम करनेवालों के साथ ही निरंतर रहता है !
और ? प्रत्यक्ष प्रभु परमात्मा भी सच्चे प्रेम का ही सदैव भूका रहता है !

इसिलिए कर्तव्य पथपर चलते चलते ,सबसे महत्वपूर्ण प्रेम ही होता है ! संपूर्ण समर्पित प्रेम !

मगर ऐसा प्रेम प्राप्त होना भी असंभव है !

क्या आप भी ऐसा प्रेम कर सकेंगे ??
जिसमें केवल और केवल शुध्द प्रेम ही हो !
जो पवित्र हो !
जिसमें संपूर्ण समर्पण हो !
जिसमें छल – कपट – स्वार्थ ना हो !!

स्वार्थ के आज के भयंकर बाजार में,लगभग ऐसा पवित्र प्रेम पाना असंभव है !
और ऐसा पवित्र प्रेम युगों युगों तक अजरामर ही रहता है !

आपका प्रेम कैसा है ?
बोलो ?

जय राधेकृष्णा !
जय राधेश्याम !!
राधे राधे !!!

हरी ओम्

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