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Fri. Oct 16th, 2026

कृष्ण भक्ति की अलौकिक कथा पढकर, आपका जीवन धन्य हो जायेगा !!!

जीसके भाग्य अच्छे होंगे,उनको यह सुंदर कृष्ण कथा…पढने को,सुनने को मिलेगी।जीसका कृष्ण प्रेम अलौकिक है…उसके आँखों में यह कथा पढते समय,कृष्ण भक्ति और दिव्य कृष्ण प्रेम से आँसुओं की जलधारा निकलने लगेगी, समझो उन्हींकी कृष्ण भक्ति अलौकिक है।भगवान श्रीकृष्ण ऐसे परमभाग्यशाली, परमभक्तों को चौ-यांशी लक्ष योनियों से मुक्ति तो जरूर देंगे ही।साथ ही निरंतर अपने सानिध्य में बसा भी लेंगे।
जय जय श्रीकृष्णा।
जय जय मुरलीमनोहर।
जय जय सुदर्शन चक्र धारी।
भगवान श्रीकृष्ण की जय हो,जय हो।
हरी हरी: ओम्

विनोदकुमार महाजन

पढीये 👇कृष्ण की सुंदर कथा।

*इस कथा को जो पढ़ेगा उसे 84 लाख योनियों से मुक्ति मिल जायेगी*
एक बार की बात है कि यशोदा मैया प्रभु श्री कृष्ण के उलाहनों से तंग आ गयीं और छड़ी लेकर श्री कृष्ण की ओर दौड़ीं। जब प्रभु ने अपनी मैया को क्रोध में देखा तो वह अपना बचाव करने के लिए भागने लगे।भागते- भागते श्री कृष्ण एक कुम्हार के पास पहुँचे । कुम्हार तो अपने मिट्टी के घड़े बनाने में व्यस्त था। लेकिन जैसे ही कुम्हार ने श्री कृष्ण को देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ। कुम्हार जानता था कि श्री कृष्ण साक्षात् परमेश्वर हैं। तब प्रभु ने कुम्हार से कहा कि ‘कुम्हारजी, आज मेरी मैया मुझ पर बहुत क्रोधित हैं। मैया छड़ी लेकर मेरे पीछे आ रही हैं। भैया, मुझे कहीं छुपा लो।’ तब कुम्हार ने श्री कृष्ण को एक बड़े से मटके के नीचे छिपा दिया। कुछ ही क्षणों में मैया यशोदा भी वहाँ आ गयीं और कुम्हार से पूछने लगीं- ‘क्यूँ रे, कुम्हार ! तूने मेरे कन्हैया को कहीं देखा है, क्या ?’ कुम्भार ने कह दिया- ‘नहीं, मैया ! मैंने कन्हैया को नहीं देखा।’ श्री कृष्ण ये सब बातें बड़े से घड़े के नीचे छुपकर सुन रहे थे। मैया तो वहाँ से चली गयीं। अब प्रभु श्री कृष्ण कुम्हार से कहते हैं- ‘कुम्हारजी, यदि मैया चली गयी हो तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो।’
कुम्भार बोला- ‘ऐसे नहीं, प्रभु जी ! पहले मुझे चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।’ भगवान मुस्कुराये और कहा- ‘ठीक है, मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से मुक्त करने का वचन देता हूँ। अब तो मुझे बाहर निकाल दो।’ कुम्हार कहने लगा- ‘मुझे अकेले नहीं, प्रभु जी ! मेरे परिवार के सभी लोगों को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दोगे तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूँगा।’ प्रभु जी कहते हैं- ‘चलो ठीक है, उनको भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने का मैं वचन देता हूँ। अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो।’
अब कुम्हार कहता है- ‘बस, प्रभु जी ! एक विनती और है। उसे भी पूरा करने का वचन दे दो तो मैं आपको घड़े से बाहर निकाल दूँगा।’ भगवान बोले- ‘वो भी बता दे, क्या कहना चाहते हो ?’ कुम्भार कहने लगा- ‘प्रभु जी ! जिस घड़े के नीचे आप छुपे हो, उसकी मिट्टी मेरे बैलों के ऊपर लाद के लायी गयी है। मेरे इन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।’ भगवान ने कुम्हार के प्रेम पर प्रसन्न होकर उन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त होने का वचन दिया।’
प्रभु बोले- ‘अब तो तुम्हारी सब इच्छा पूरी हो गयीं, अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो।’
तब कुम्हार कहता है- ‘अभी नहीं, भगवन ! बस, एक अन्तिम इच्छा और है। उसे भी पूरा कर दीजिये और वो ये है- जो भी प्राणी हम दोनों के बीच के इस संवाद को सुनेगा, उसे भी आप चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करोगे। बस, यह वचन दे दो तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकाल दूँगा।’
कुम्भार की प्रेम भरी बातों को सुन कर प्रभु श्री कृष्ण बहुत खुश हुए और कुम्हार की इस इच्छा को भी पूरा करने का वचन दिया।
फिर कुम्हार ने बाल श्री कृष्ण को घड़े से बाहर निकाल दिया। उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। प्रभु जी के चरण धोये और चरणामृत पीया। अपनी पूरी झोंपड़ी में चरणामृत का छिड़काव किया और प्रभु जी के गले लगाकर इतना रोये कि प्रभु में ही विलीन हो गये।
जरा सोच करके देखिये, जो बाल श्री कृष्ण सात कोस लम्बे-चौड़े गोवर्धन पर्वत को अपनी इक्क्नी अंगुली पर उठा सकते हैं, तो क्या वो एक घड़ा नहीं उठा सकते थे। लेकिन बिना प्रेम रीझे नहीं नटवर नन्द किशोर। कोई कितने भी यज्ञ करे, अनुष्ठान करे, कितना भी दान करे, चाहे कितनी भी भक्ति करे, लेकिन जब तक मन में प्राणी मात्र के लिए प्रेम नहीं होगा, प्रभु श्री कृष्ण मिल नहीं सकते। जय श्री कृष्ण। जय श्री राधे राधे।
*एक सुंदर कथा भेजी है, विश्वास और मनन कीजिये। अच्छी लगे तो दूसरों को भी भेजिए!*
प्रार्थना नष्ट नहीं होती। उपयुक्त समय पर क्रियान्वित होती हैं। ईश्वर सदैव आप सभी को स्वस्थ व सुखी रखें।

जय श्री राधेकृष्ण
🙏🏻🙏🏻💐💐

संकलन : – विनोदकुमार महाजन

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