Wed. May 20th, 2026

कूंवा सूख गया

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*कूंवा ही सूख गया…?*
✍️ २८६७

*विनोदकुमार महाजन*

👆👆👆👆

*शायद…*
यह एक काल्पनिक बोधकथा भी हो सकती है…अथवा ?
हकीकत भी ??

एक छोटासा गांव था !
हराभरा , संपन्न , खुशहाल !
हरी भरी खेती , हरे भरे प्रसन्न मन, पाणी से भरी हुई नदीयां , कूंवे…
सबकुछ आबादी आबाद था !

सब धन से भी अमीर थे और ? सब के सब ?
मन के भी अमीर थे !

ना जातीवाद था , ना जातीभेद भी था !
ईश्वर के सब एक ही संतांन बडा खुशहाल जीवन जी रहे थे !

हर एक के अंदर ईश्वर का ही वास होता है , ऐसा समझकर , एक दूसरे का बडे आनंद से संन्मान करनेवाले लोग थे वहां ! हर एक अंदर ममत्व था , प्रेम था , स्नेह था !
आपसी लगाव और तालमेल था !

सभी लोग एक दूसरे को बडे ही आनंद से और प्रेम से…
*रामराम* बोलते थे एक दूसरे को !

मैं भी राम
तू भी राम…
यह भाव मन में रखकर
रामराम बोलते थे !

दूसरों का दुखदर्द , पीडा खुद का समझ कर , दूसरों को आधार देनेवाले लोग थे…तकरीबन नब्बे प्रतिशत से भी जादा ऐसे लोग होंगे उस गांव में !

सिधेसादे , भोलेबाले , सभी पर सच्चा प्रेम करनेवाले !

धीरे धीरे समय बदलता गया…!
इंन्सान भी बदलता गया…धीरे धीरे…!

एक बार…
गांव में सूखा पड गया…
बहुत ही बडा सूखा…
नदीयां , तालाब , कूंवे सूखे पडते गये…
हरा भरा गांव , धीरे धीरे कंगाल होता गया…

इंन्सानों के मन भी धीरे धीरे सुखे होते गये !
हर एक के मन से हरीभरी दूनिया उजड सी गई !
हर एक का मन भी सूखता गया !
उदास मन का समाज और समाधान शून्य समय के कारण ?
समाज के संस्कार भी गायब होते गये ??
धीरे धीरे…

आपसी प्रेम , भाईचारा खतम होता गया !

एक दूसरे को बडे प्रेम से और आनंद से, रामराम बोलना तो दूर की बात , एक दूसरे का मुंह देखने को भी कोई तैय्यार नहीं हो रहा था !

लडाई झगडा बढता गया !
स्नेह की जगह बैर ने ले ली !

धरती माता का प्यार भी सूख गया ! धरती माता उजाड और उदास हो गयी !
नदीयां कूंवे भी सूखते गये !

ऐसा क्यों हो गया ?
कैसे हो गया ?
ईश्वर का कोप हो गया शायद ?

सनातन धर्म एक आदर्श जीवन पध्दती थी उस गांव की !
इसका आचरण लोग बहुत ही आनंद से करते थे !

मगर…?
धीरे धीरे समय बदलता गया !
सनातन धर्म के प्रती स्नेह , प्रेम , आदर था…इसकी जगह नफरत में बदल गयी !

साधू संतों को ?
महापुरूषों को ?
देवीदेवताओं को ?
*हमारे ही* ??
लोगों द्वारा ?
बदनाम किया जाने लगा ? प्रताडीत , अपमानित किया जाने लगा !
*हमारे ही लोग ?*
गौमाता का मांस भक्षण भी ? बडे ही आनंद से करने लगे ?

गांव में एक
कूंवा था ,कभी भी ना सूखनेवाला !
ईश्वर की कृपा से उसमें सभी की प्यास बुझाने के लिये ?
बहुत जादा मात्रा में पाणी भी था !
मानो ? अमृत जैसा जल !

*मगर…*??
इंन्सानों के मन बदल गये और ?
वह इकलौता कूंवा भी ?
सूख गया !

*हाय राम…गजब हो* *गया…*

समाज में ?
राम ही खलनायक लगने लगा ?
*और ??*
रावण ? नायक ??
लगने लगा ?

बडे आनंद से फिल्मों में और प्रत्यक्ष भी नाचते हुए लोग…
*भूत हूं मैं…भूत हूं मैं…*
ऐसा आनंद से चिल्लाने लगे !

हराभरा संपन्न गांव आखिर ?
बरबाद हुवा ?
हर जगह जातीवाद का भयंकर जहर भर गया !
जातीवाचक गाली गलौच का भंडार ही खूल गया !

सबकुछ हाय तौबा ही हो गया !

यह सबकुछ आक्रीत विपरीत क्यों और कैसे हो गया ? किसी के समझ में भी नहीं आया !

*हरे रामा*
अब तू ही मंदबुद्धी इंन्सानों को समझा देना !

👆🙏🙏🙏

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