Sun. Apr 26th, 2026

कालाय तस्मै नम:

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*आत्मा मरे हुए लोग ?*
✍️ २८४६

*_विनोदकुमार महाजन_*

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जहाँ आत्मा होती है ?
वहाॅं आत्मतत्त्व भी होता है… जागृत आत्मतत्त्व
जिसे चेतना , संवेदना भी कहते है !

मगर ?
हमारे समाज में सचमुच में ? क्या आत्मीयता समाप्त होती जा रही है ? या फिर समाप्त हो गई है ?

क्यों ? क्योंकी…
इस भयंकर भागदौड के जीवन में और संघर्षमय जीवन शैली में ?
हर एक व्यक्ती अपने अस्तित्व के लिये दिनरात लड रहा है , झगड रहा है !

और इसी भागदौड में शायद खुद को भी भूल रहा है ? भूल गया है ? खुद के अंदर के आत्मा को भी भूल गया है…
तो ? आत्मतत्त्व कैसे जीवीत रहेगा !

हर एक व्यक्ती हरदिन दौड रहा है , भाग रहा है ! पैसों के लिये ? या फिर पैसों से मिलने वाले सभी भौतिक सुखों के लिये ?

खुद के भागदौड में हर एक व्यक्ती इतना व्यस्त है की , दूसरों के अस्तित्व के बारे में , दूसरों के सुखों के बारे में ? सोचने के लिये ? उसके पास समय ही कहाॅं है ?
समय नहीं है शायद ?

रास्ते पर कोई एक्सिडेंट से तडप तडप कर मर रहा है ? तो भी ? उसे देखने के लिये अथवा अस्पताल पहुंचाने के लिये किसीके पास समय ही नहीं है ?
अथवा समय भी है तो ?
कोई व्यक्ती उसकी विडिओ शुटींग बनाता है और ? आगे निकल जाता है ?

क्योंकी इसका विडिओ बनाकर उसके युट्यूब चैनल पर लगाना है और ? पैसा कमाना है !?

यही आत्मीयता हमारे समाज में बची है ?

*ये कहाॅं आ गये हम ?*

तडपतडपकर कोई , पाणी पाणी करके मर रहा है और ? लोग उसपर हॅंस रहे है ?
यही आत्मीयता है बची है समाज में ?
या फिर सामाजिक विडंबन है ये ?
सामाजिक अंध:पतन ?

अस्तित्व ?
खुद का अस्तित्व ? बनाये रखने के लिये ? पैसा कमाने की होड है ? चारों ओर…
और उस पैसा कमाने की होड से ? मरती हुई आत्मीयता ?

यह कौनसा सामाजिक उत्कर्ष है ?

जनसंख्या तो बढ गई ?
जनसंख्या विस्फोट भी हो गया !
मगर आत्मियता मर सी गई ?

जनसंख्या विस्फोट में ?
एक प्रामाणिक व्यक्ती ढूंडना भी लगभग असंभव हो गया ?

कोई किसी के बारे में , दूसरों के सुखदुःख के बारे में ? सोचने के लिये भी आज कोई तैय्यार नहीं है ?
तो उसे आधार देने की दूर की बात है !

मरी हुई आत्मीयता ?

कहाॅं मर गई आत्मीयता ? एक दूसरे के प्रती स्नेह भाव ? प्रेम भाव ?

मरे हुए मन की जींदा लाशे ? ?
समाज में बन रही है चारो ओर ?

देखने को देह तो है ? उसमें जागृत आत्मतत्त्व भी है ?
मगर ? अंदर की संवेदना ही मर गई है ?
आत्मतत्त्व तो जागृत है ? मगर आत्मीयता की चेतना सी मर गई है ?

आत्मा मरी हुये जींदा लोग ?
मगर आत्मा तो कभी भी मरती नहीं है ?
फिर भी ऐसा कैसे और क्यों हो गया ?

*आत्मा का अंधियारा ?*

हमारा आदर्श सनातन धर्म तो…?
” *सर्वांभूती भगवंत…”*
दिखाता भी है और सिखाता भी है !

तो ? भगवंत के साथ भी ?
आत्मियता शून्य आचरण कैसे हो गया ?

शरीर तो है ? मगर मन ही मर गया है तो ?
यह जींदा लाशे भी ?
ईशत्व को कैसे पहचानेंगी ?

और जहाँ ईशत्व की पहचान ही नहीं है वह ?
आत्मीयता क्या और कैसे दिखाएंगे ?

क्या संस्कृती संपन्न देश में सचमुच में यही सांस्कृतिक उत्थान है या फिर ? यह भयंकर और ?
विनाशकारी सांस्कृतिक अध:पतन है ?

और जहाँ सांस्कृतिक अध:पतन होता है ? वह समाज क्या सचमुच में ? दैवीय चेतना के अनुसार ?
वैश्विक ईश्वरी सिध्दांतों की पुनर्स्थापना भी कर सकेगा !

खुदगर्ज समाज में सचमुच में इंन्सानियत भी जींदा रह सकती है ?

और जहाँ इंन्सानियत ही लगभग मर रही है ? वहाॅं ?
उस समाज में ? आत्मीयता भी देखने को कैसे मिलेगी ?

समय के हाथ की चेतना शून्य ?
सब कठपुतलीयाॅं बनती जा रही है धीरे धीरे ?

क्या यह मरी हुई चेतना सचमुच में आत्मीयता भी जींदा रख सकेगी ?
या फिर ऐसा प्रयास भी कर सकेगी ?

जिसने , जिस पवित्र आत्माओं ने ?
स्वर्गीय पवित्र आत्माओं के साथ अपना जीवन बिताया है ? जीवन गुजारा है ?
आत्मियता जिनके अंदर रोम रोम में बसी है ?
ऐसे व्यक्ती क्या ऐसे समाज में ?
सचमुच में अपनापन महसुस भी करेंगे ?

हर दिन रूक्ष बनते समाज में ? समाज मन में ?रूखे मन के लोगों के संपर्क में ?
सचमुच में उच्च कोटी की आत्मानुभूती भी मिलेगी ? जींदा भी रहेगी ?

या फिर मतलब की दुनिया और मतलब की दुनियादारी में ?
ऐसे लोगों का दम निरंतर घूटता ही रहेगा ?

समस्या गहन है , प्रश्न गंभीर है ! और उत्तर ?
ना के बराबर है ?
या फिर उत्तर ?
कुछ भी नहीं है…!!?

यह सामुहिक सामाजिक अंध:पतन आखिर जा भी कहाॅं है ?
संपूर्ण विनाश की ओर ?

या फिर ?
कलियुग के अंत की ओर…??

*कालाय तस्मै नमः*

🙏💔❤️‍🔥💘

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